जयपुर। प्रदेश में चल रहे फार्मेसी कॉलेज बंद होने की स्थिति में आ गए हैं। इस बार फार्मेसी पाठयक्रमों बी.फार्मा और डी.फार्मा की 90 प्रतिशत से ज्यादा सीटें खाली पड़ी हैं। बताया जा रहा है कि इस वर्ष फार्मेसी पाठयक्रमों में सबसे कम प्रवेश हुए हैं। फार्मेसी के प्रति छात्रों की अरूचि का कारण नौकरियों की कमी बताया जा रहा है। इसके अलावा फार्मेसी कॉलेजों में स्तरीय शैक्षणिक सुविधाओं की कमी भी इसी ओर छात्रों की रूचि में कमी ला रही है। लिहाजा प्रदेश में फार्मेसी की शिक्षा व रोजगार का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है।
प्रदेश में लगभग 51 निजी और सरकारी फार्मेसी कॉलेज हैं। इनमें बी.फार्मा की 2400 और डी.फार्मा की 1500 सीटे हैं। इन सीटों में से 15 प्रतिशत मैनेजमेंट कोटे के लिए आरक्षित रहती हैं। शेष 85 फीसदी सीटों का हाल यह है कि बी.फार्मा की 2040 सीटों में से सिर्फ 104 और डी.फार्मा की 1284 सीटों में से मात्र 131 सीटों पर ही प्रवेश हो पाए हैं। शेष सीटें खाली पड़ी हैं।
ऎसे में फार्मेसी कॉलेजों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। जानकारों का कहना है कि पिछले तीन-चार वर्ष से प्रवेश में लगातार कमी आ रही है, लेकिन इस बार तो स्थिति बहुत ही खराब है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुल उपलब्ध सीटों में से करीब 90 प्रतिशत खाली जा रही है। इससे न सिर्फ फार्मेसी कॉलेजों के सामने संकट खड़ा हो रहा है, बल्कि प्रदेश में इसकी दुर्दशा भी बयां होती है।
रोजगार का संकट, 35000 बैठे हैं ठाले
फार्मेसी पाठयक्रमों के प्रति छात्रों में इस अरूचि का कारण यह है कि फार्मेसी के क्षेत्र में नौकरियां नहीं हैं। राज्य में करीब 35 हजार फार्मासिस्ट बेरोजगार बैठे हैं। राजस्थान युवा फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीणकुमार सैन का कहना है कि राज्य सरकार ने पिछले 26 वर्ष मे फार्मेसिस्ट के पद पर एक बार भी नियमित भर्ती नहीं की है। जबकि कानूनन हर सरकारी अस्पताल में दवा वितरण और स्टोरेज का काम फार्मासिस्ट से ही कराया जाना अनिवार्य हैं। अस्पतालों में यह काम नर्सिग कर्मचारी कर रहे हैं। औषघि नियंत्रण विभाग की स्थिति यह है कि प्रदेश में 175 औषघि निरीक्षक होने चाहिए, लेकिन सिर्फ 45 पद स्वीकृत हैं।
सहायक औषघि नियंत्रकों के 42 पद होने चाहिए, जबकि अभी सिर्फ 17 पद स्वीकृत हैं। निजी क्षेत्र की स्थिति यह है कि प्रदेश में दवा निर्माता कम्पनियां बहुत कम संख्या में हैं और निजी अस्पतालों में नियमों का उल्लंघन किस हद तक होता है यह सब जानते हैं।
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